मर्द-ए-ज़िगर

जमाने ने कह दिया मर्द को दर्दः नहीं होता और मर्द भी चुप बेठ गया अपने ग़मो को समेट कर ज़माना डरता रहा कहीं मर्द–ए–दिल को टटोला गया तो सेहलाब ना आ जाये मर्द–ए–दर्दः की चींख से कहीं क़यामत ना आ जाये मर्द कितना कमजोर है मर्द कितना लाचार है तभी तो घुट–घुट के जीता रहा और फ़ना होता रहा यारो तभी तो घुट–घुट के जिते गए और फ़ना होते गए जाते भी कहा अपना दर्दः भरा फसाना लेकर जाते… Read more